गौरी गजानन भगवान की जय,खुर्रावाली माता की जय, भीलट देव की जय
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आचार्य गजेंद्र शर्मा पिछले कई विगत वर्षों से उज्जैन मैं निवास कर रहे हैं भगवान महाकाल की कृपा से गुरु कृपा से वेद एवं ज्योतिष मैं आचार्य पूर्ण कर पूजन पाठ कर्मकांड कालसर्प मंगल भात पूजन व यज्ञ एवं वास्तु पूजन जिन्होंने असंख्य करवा दी है बगलामुखी के विशेष अनुष्ठान से इंडस्ट्रीज नेता यजमान के कार्य सिद्ध व सफलता दिलाई है एवं विशेष व्यापार वृद्धि व कर्जा मुक्ति विवाह एवं संतान प्राप्ति के लिए विशेष गणपति अनुष्ठान किया जाता हैं |
आचार्य जी के द्वारा अवंतिका के फलित ज्योतिष से जन्म पत्रिका मिलान व् फलादेश किया जाता हैं
सामान्यतः जन्म कुंडली के बाकी सात ग्रह राहु और केतु के मध्य स्थित हो जाते हैं तो उस स्थिति को "कालसर्पयोग" कहते हैं। राहु सर्प का मुख माना गया है और केतु सर्प की पूँछ।
काल का अर्थ है मृत्यु यदि अन्य ग्रह योग प्रबल ना हों तो ऐसे जातक की शीघ्र ही मृत्यु भी हो जाती है और यदि जीवित रहता भी है तो प्रायः मृत्युतुल्य कष्ट भोगता है।
इस योग के प्रमुख लक्षण एवं प्रत्यक्ष प्रभाव मानसिक अशांति के रूप में प्रकट होता है। भाग्योदय में बाधा, संतति में अवरोध, गृहस्थ जीवन में नित्य प्रायः कलह,
परिश्रम का फल आशानुरूप नही मिलना,दुःस्वप्न आना, स्वप्न में सर्प दिखना तथा मन में कुछ अशुभ होने की आशंका बने रहना इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
कालसर्प योग को तीन अलग अलग भागों में विभक्त किया गया है :- 1) पूर्ण कालसर्प - जब सभी ग्रह राहु और केतु के मध्य ही स्थित हों तो पूर्ण कालसर्प योग बनता
है।
मंगल ग्रह यदि जन्मकुंडली के लग्न, चतुर्थ भाव, सप्तम भाव, अष्टम भाव, द्वादश भाव में हो तो कुंडली को मांगलिक माना जाता है, ऐसा होने पर ऐसे जातक का विवाह भी
मांगलिक स्त्री या पुरुष से ही करना चाहिए| इसी प्रकार शनि देव यदि जन्मकुंडली के लग्न, चतुर्थ भाव, सप्तम भाव, अष्टम भाव, द्वादश भाव में हो या दृष्टिगत भी हो तो
कुंडली में मांगलिक योग का परिहार हो जाता है, सभी मांगलिक कुंडलियो में मांगलिक दोष हो ऐसा जरुरी नहीं होता है, लोग व्यर्थ में मांगलिक योग सुन के भयभीत हो जाते
है, जबकि मंगल ग्रह तो शुभ कार्य, भूमि, ऋणहरता एवं फल प्रदान करने वाले देवता है, कुंडली में मंगल जब ख़राब होता है तब इन्सान , कुछ दोगल होजाता है , और यही
कारन है की वहा अपने जीवन में अक्सर सफल होता है, एसा इन्सान मोम की तरह पिघल ता रहता है|
महामृत्युंजय मंत्र का जाप क्यों किया जाता है ? शास्त्रों और पुराणों में असाध्य रोगों से मुक्ति और अकाल मृत्यु से बचने के लिए महामृत्युंजय जाप करने का विशेष उल्लेख मिलता है। महामृत्युंजय भगवान शिव को खुश करने का मंत्र है।
इसके प्रभाव से इंसान मौत के मुंह में जाते-जाते बच जाता है, मरणासन्न रोगी भी महाकाल शिव की अद्भुत कृपा से जीवन पा लेता है। बीमारी, दुर्घटना, अनिष्ट ग्रहों
के प्रभावों से दूर करने, मौत को टालने और आयु बढ़ाने के लिए सवा लाख महामृत्युंजय मंत्र जाप करने का विधान है। जब व्यक्ति जाप न कर सके, तो मंत्र जाप किसी
योग्य पंडित से भी कराया जा सकता है। समुद्र मंथन के बहुप्रचलित आख्यान देवासुर संग्राम के समय शुक्राचार्य ने अपनी यज्ञशाला मे इसी महामृत्युंजय के अनुष्ठानों का
उपयोग देवताओं द्वारा मारे गए राक्षसों को जीवित करने के लिए किया था। इसलिए इसे मृत संजीवनी के नाम से भी जाना जाता है।
हिंदू धर्मशास्त्रों के मुताबिक भगवान शिव का पूजन करने से सभी मनोकामनाएं शीघ्र ही पूर्ण होती हैं। भगवान शिव को शुक्लयजुर्वेद अत्यन्त प्रिय है कहा भी गया है वेदः शिवः शिवो वेदः। इसी कारण ऋषियों ने शुकलयजुर्वेदीय रुद्राष्टाध्यायी से रुद्राभिषेक करने का विधान शास्त्रों में बतलाया गया है यथा – रुद्राभिषेक क्यों करते हैं? रुद्राष्टाध्यायी के अनुसार शिव ही रूद्र हैं और रुद्र ही शिव है। रुतम्-दु:खम्, द्रावयति-नाशयतीतिरुद्र: अर्थात रूद्र रूप में प्रतिष्ठित शिव हमारे सभी दु:खों को शीघ्र ही समाप्त कर देते हैं। वस्तुतः जो दुःख हम भोगते है उसका कारण हम सब स्वयं ही है हमारे द्वारा जाने अनजाने में किये गए प्रकृति विरुद्ध आचरण के परिणाम स्वरूप ही हम दुःख भोगते हैं। रुद्राभिषेक का आरम्भ कैसे हुआ ? प्रचलित कथा के अनुसार भगवान विष्णु की नाभि से उत्पन्न कमल से ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई।







